पलकों की झालर के पीछे
नयनो की गहरी झीलों में
उठती छोटी-छोटी लहरों पे तैरती हैं
तरी इच्छाओं की
लदी तारों से और जुगनुओं से
जिनसे क्रीडा करती हैं भावनाओं की स्वर्णिम जलपरियाँ
कुछ इन्द्रधनुषी प्रतिबिम्ब तैरते हैं
तब स्वपन के सुन्दर कमल खिलते हैं
संध्या क्षितिज से अधिक आकर्षक
एवं आकाश-गंगा से अधिक दीप्यमान…